SANSKRITIK SANGAM,Salempur

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THEATRE AND LITERATURE

Posted by [email protected] on June 1, 2014 at 12:30 AM Comments comments (1)

आरम्भिक साहित्य और नाट्यमंच

नाट्य मंच ओर नृत्य ,जो भारतीय संस्कृति कला- विधा के अविभाज्य अंग हैं। जो भारतीय पौराणिक साहित्य में भी विद्यमान थी। वैदिक साहित्य या चारों वेद जो उपनिषद् व् ब्राह्मण , जो हिन्दू सभ्यता के रुप में प्रतिष्ठित है ,में नृत्य व् खुले आकाश के तले नाट्य मंचनों का प्रदर्शन व् अभिनय के उल्लेख मिलते हैं। .वरना वेदों में देवताओं को ,आमंत्रण व् प्रार्थना के मन्त्र ,कर्मकांड व् लघु कथाएं ही उपलब्ध है। . . .

वैदिक परंपरा में सैकड़ों वर्ष मौखिक रूप से विकसित श्रुति एवं स्मृति ज्ञान को उत्तर वैदिक काल में लिखित रुप में विकसित होने लगा तो कई देवताओं के, जो वास्तव में प्रकृति के स्वभाव को ही आदर्श जीवधारी के रूप में प्रस्तुत किये पाये गए तो उसे सामान्य व्यक्तिओं को समझने में कई जटिलताएं सामने आये। कालांतर में व्यक्तिगत दृष्टिकोणों द्वारा उन्हें सविस्तार पुराणों के रूप में प्रकट किये गए । इन्ही पौराणिक कथाओं के माध्यम से भारतीय नाट्यकला मंचनों के लिए बहुतायत मुख्य विषय वस्तु व् प्रकरण बने। .

संस्कृत ,एक शास्त्रीय भाषा ,

संस्कृत ,भारतीय सभ्यता की उत्तम पारम्परिक व् शास्त्रीय भाषा है। . चारों वेद संस्कृत में लिखे गए हैं। उसके बाद .बहुत सारे साहित्यिक कृतियों के संग्रह संस्कृत भाषा में किये गए ,संस्कृत नाटकों को भी।संस्कृत .व्याकरणाचार्य पाणिनि के द्वारा ५ वीं ईसा पूर्व शताब्दी में नाट्य अभिनय पर एक लघु व्याख्यान का उल्लेख मिलता है। .

 

 

 

Gyanaarjan

Posted by [email protected] on May 29, 2014 at 10:50 AM Comments comments (0)


 आज की दुनिया में ,ज्ञान-ज्ञानार्जन के मार्ग तीन विधियों में बंटा है।प्रत्येक व्यक्ति के नित्य जीवन के सम्बन्ध  तथ्यात्मक ज्ञान जो अवधारणाओं पर आधारित होता है ,जिसमें व्यक्ति ,सत्य और विस्तृत जानकारी के आधार पर व्यवहार करता है ,और कल्पनाओं पर आधारित हो तो उसे असत्य मानकर त्याग देता है,दूसरे वर्ग में वे लोग आते हैं जो असाधारण या प्रतीयमान जगत को सत्य मान कर सम्मान देते हैं,जिसे देख या सुन नहीं सकते उसे या उससे ,असत्य या अस्तित्वहीन सा व्यवहार करते हैं। तीसरे वर्ग के लोग वे हैं जो किसी एक वस्तु का ,दूसरे वस्तुओं में अंतर न देख ,या यों कहे कि संसार की सारे वस्तुओं में समानभाव रखते हैं। पूरे संसार को समान भाव से ईश्वर द्वारा निर्मित व् उन से आच्छादित सा देखते हैं ,यही आध्यात्मिक ज्ञान है ,निःसंदेह प्रतीयमान संसार का ज्ञान आवश्यक है ही ,परन्तु उसके आगे भी जो शाश्वत, नित्य और निरंतर सत्य हैं, वह उससे भी अधिक आवश्यक है।शिक्षा का अर्थ यह नहीं की बहुत व्यस्त हो जाना और समाप्त हो जाना,यह तो जीवन का एक पहलू है ,सतगुण और नैतिकता जीवन का मेरुदण्ड है, तो आध्यात्मिक पथ एकमात्र माध्यम है इसे विकसित करना। 

KALAA SRISHTI

Posted by [email protected] on December 7, 2013 at 3:10 AM Comments comments (0)

            कला सृष्टि से पहले विश्व सृष्टि हुई ,विश्व सृष्टि में चल और अचल दोनों विधाएं हैं ,चल ,काल को दर्शाते हैं ,अचल ,स्थल  को  .. स्थल स्थिति के और काल गति के प्रतिनिधिओं  की तरह स्थापित हैं। ,
           
कला सृष्टि में काल और स्थल प्रधान है ,इसमें चल कलाएं और अचल कलाएं हैं ,संगीत ,कविता ,काव्य, नाट्य यह चल कलाएं हैं चित्र, शिल्प,वास्तु  सभी अचल कलाएं,इसीलिए संगीत ,कविता,नाट्य आदि काल से सम्बंधितहै ,शिल्पकला ,वास्तुकला ,चित्रकला ,हस्तकला इत्यादि स्थल से सम्बंधित है यही स्थान -काल विशेष के सौंदर्य अलंकार संस्कृति के द्योतक हैं ....
            ललित कलाओं  एवं  व्यवहारिक  कलाओं को व्यावसायिक  कलाओं जैसा विभाजन करने वाली पाश्च्यात  दृष्टि भारतीय चेतन के विकास क्रम की उस दृष्टि से अपरिचित रही है जो पदार्थ से परमार्थ की और जाने के लिए
क्रमशः तत्त्व स महत्व तथा परमतत्व तक पहुँच कर परात्पर से सुन्दर आकार और आनंद गुंजार को ललित कला कराती है ..वैसे ललित कलाओं को  आज की भारतीय परिवेश में मात्र चित्रकला या वास्तु कला तक ही सीमित समझा जाता  है....परन्तु ऐसा नहीं है ...
                आदि मनीषी अगस्त्य ॠषी की पत्नी लोपमुद्रा ने अपने श्रीललिता   सहस्र नामावली स्तोत्र में ललिता  देवी को  चतुश्शाष्टि (चौंसठ )कलामयी  कहकर स्तुति की है. ललित कला  वह कला एवं विद्या है जिसको व्यक्त करने में सौंदर्य की अभिव्यक्ति होती है ,आदि शंकराचार्य ने भी  इसी स्तोत्र के आधार पर सौदर्य लहरी की रचना की .... इन  चौंसठ कलाओं की दृष्टि हमारे मनीषियों ने दी है ,चित्र,मूर्ति ,काव्य और वास्तु जैसी पञ्च ललित कलाओं और उनसठ उपयोगी कलाओं की और दृष्टि  पात करें  तो चौदह विधाओं के तत्व विभिन्न पदार्थों के आकार -प्रकार द्वारा सुख -सुविधा ,कौशल ,उपयोगिता,क्षमता ,शील ,सामर्थ्य ,आकर्षण और सौंदर्य  रचने की शिक्षा एवं चेतना का उत्तरोत्तर आगे बढ़ने की इच्छा का दर्शन होता है। पदार्थ द्वारा सुखार्थ की रचना और बिना पदार्थ के ललितार्थ   पाकर मानव मन आनंदित होगा ही  ..जीव की मानसिक चैतन्य काया ललित कला है सृजन ,वंदन, के योग- संयोग और प्रयोग के परिणाम स्वरुप  मोक्षानुभूति  के रमण  द्वारा ललित कला में डूबने वाला ही पार उतरता है
                  भारतीय कलाएं विश्व कलाओं का एक भाग है .भारतीय कालों में उत्तर भारतीय कलाएं एक भाग है अतः विश्व कलाओं में एक भाग उत्तर भारतीय कला हुई यह भी सत्य है सभी  देशों की कलाएं  एक सी नहीं होती
..जिसकी सृष्टि उसी को  प्यारी प्रत्येक देशों की कलाएं अन्य देशों की कलाओं में एकत्व्ताएं -भिन्नताएं भी गोचर होंती हैं अतः उत्तर भारतीय कलाएं भी वही है /यहाँ उत्तर भारतीय कलाएं और संस्कृति अन्य संस्कृतियों व कलाओं से उत्कृष्ट है कहना संकुचितता  का ध्योतक  है .इस विशाल जगत में प्रत्येक जातियां एक प्रत्येकता लिए हुए है हर एक संस्कृति में एक विशेष संस्कृति विद्यमान है .हर कला एक विशेष कला है इसमें कोई भी मात्र उत्कृष्ट  नहीं है . उत्तर भारतीय कलाएं भी बहुत प्राचीन है उत्कृष्ट भी हैं .....प्राचीन है इसलिए उत्कृष्ट है समझना  नहीं चाहिये ...प्राचीनकलाओं  में भी कुछ उत्कृष्ट हो  सकते  हैं ...निकृष्ट भी हो सकते हैं ...उत्कृष्टता है इसलिए उत्कृष्ट है ....
             उत्तर  भारतीय कलाओं में   आज हिंदुस्तानी संगीत के  आधार पर कत्थक नृत्य ,कव्वाली   कुछ एक लोकगीत  के अलावा  भक्ति गीतों में रसिया ( पश्चिम में राधा कृष्ण  पर आधारित )गीत या निर्गुन  में भक्ति गीत ही मात्र  शात्रीय विधाओं में गाये  जाते हैं .बाकी लोक गीत ही अधितमप्रचलित है  जिसमे शाश्त्रीय संगीत  की आवशयकता  नहीं होती  .शाश्त्रीय गीतों को सुनाने वाले हैं पर सुनने वाले  प्रायः समाप्त ही हैं  ..अन्य कलाओं में नौटंकी  विधा भी लोगों को भाति नहीं है,आल्हा गायक कोई रहा नहीं ,बिरहा तो अब गाने  वाले बिरले ही हैं ...नाट्य रूप में रामायण की रामलीला रसविहीन होकर रह गयी ,उसे मात्र दान- दक्षिणा लेने का धंदा जैसा प्रतीत होता है ......रासलीला ,.कृष्णा लीला,शिव लीला ,श्याम महोत्सव आदि  के नाम पर कुछ फ़िल्मी धूनों  पर मंच पर इधर से उधर मात्र  दौड़ते नजर आते हैं ,इन सभी विधाओं  से साहित्य ,का सौंदर्य ,गीतों की मधुरता ,ध्वनि  की
धमक ,बाँसुरी  व शहनाई की मधुर प्राकृतिक  कर्ण प्रिय राग सुनाई  नहीं देती है  पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो और ही बुरा हाल है  ,कहीं भी देखो ऋतु  गीतों में कजरी,सोहर,बिरहा ,चैती ,चैता  सावनी या कवी सम्मलेन...नृत्य  देखना दिखाना हो तो एक हेमा मालिनी  या  राजस्थानी व डांडिया को अन्य प्रदेश से बुलवाकर  पीठ ठुकवा लेते हैं  ,कला के नाम पर जो अलबम बन रहे हैं अश्लील गीतों से इस प्रांतीय युवाओं को पथ भ्रष्ट  किया जा रहा है .फिल्मों का हाल उस से भी बदतर ....विद्या संस्थाओं  में बच्चों के  सांस्कृतिक कार्यक्रमों  में सिर्फ और सिर्फ फ़िल्मी गाने ही नजर आते हैं ....फिल्मी नृत्य  तो और भी  असभ्य .... कला के  साधक नजर नहीं आते ...संगीत के साधक ,साहित्य के साहित्यकार ,गीतों के गीतकार गायनी के गायक ,वाद्य यंत्रोंके वादक ,सिन्थेसैसर  व पैड   क्या  पा गए ,सारे
नाद,श्रुति,स्वर ,थाट  व राग  की पूर्ति  कर लेने के भ्रम पाल   लिए है जनता को तो धांय धांय  आवाज  चाहिए . जनता क्या जाने राग स्वर श्रुति और धुन..सभी शार्ट  कट रास्ते  अपना लिए है ..
                 हिंदुस्तानी  संगीत ,कर्नाटक  संगीत(जिसे उच्चकोटि  का मानते हैं;) से अलग है ही नहीं वह भी भारतीय संगीत ही है जो वैदिक  काल से सामवेद के उपवेद गन्धर्व वेद  के नियमों  व    सिद्धांतों ..के आधार पर ही बने हैं ...दोनों संगीत को मुगलों ने आकर विभाजित किया वर्ना दोनों संगीत पद्धति की आत्मा एक ही है ..पर वैदिक काल में  यह संगीत  सिद्धांत  भी लोक गीतों के  आधार  व माध्यम  से ही  बने ..इसलिए लोक गीत व संगीत अपने आप मेंमधुरता  लिए होते हैं
                मुगलों  के आक्रान्ताओं ने   नौ से दस शताब्दी पूर्व  हिन्दू संस्कृति की सारी सभ्यता को ही नष्ट कर दिया ,मंदिर तो मंदिर घर के अन्दर घुस घुस के स्त्रियों से दुराचार व  ,पुरुषों को धर्म परिवर्तन ,धार्मिक व संस्कृति के सारे पुस्तक ग्रन्थ जला  डाले   गये  इसकी यातना अधिक तम भारत में उत्तर भारतियों को ही झेलना पड़ा ...परिणाम स्वरुप  या तो स्त्रियों को जन्म देना बंद हुआ या उन्हें शिक्षा दीक्षा से दूर कर दिया गया   ऐसे में कलाएं तो कोसों दूर की कौड़ी थी ...और  जो साधक थे या जिनकी वृत्ति ही नाट्य नृत्य संगीत था वे मुगलों के मनोरंजन के साधन बने. तब से ही ख़याल, गजल ,शायरी ,कव्वाली   पैदा हुए
               अंग्रेजों का जुल्म तो और भी भयंकर था सीधे भारतीय  संस्कृति पर ही चोट करने की मन्शा से भारतीय संस्कृति के तत्वों  और प्रतीकों को चुन चुन कर अपमानित किया ...राम और कृष्ण को काव्य कल्पना बताया ,,संस्कृति को धर्म बताया ...धर्म को मजहब के बराबर खडा किया ...  भारत के राष्ट्र जीवन का शील ,मर्यादा ,संयम और आचार -विचार -व्यवहार प्रगति विरोधी करार दिया अंग्रेज भक्त क्लर्क  बनाने वाली शिक्षा पद्धति थोपी.....लार्ड
मैकाले  की कुत्सित विचारों द्वारा देश भक्ति के खात्मे वाली  शिक्षा की रूप रेखा बनायी ..,.स्वाधीन भारत आज भी मानव संसाधन के नाम पर मनुष्य  को मैन  पॉवर  व सूचनाओं का यन्त्र  बना रहा है    विवेक व ज्ञान की शिक्षा
पद्धति समाप्त हो गयी है .....  मनुष्य तनाव ग्रस्त  हो गए हैं ...पशुवतहो गए हैं।। ..............................

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              न वेत्त शाश्त्र वित्कर्म ,न शाश्त्र  मपि  कर्मवित
              यो वेत्ति  द्वय मप्येतत ,सह चित्र  करो वरः
              भोज महाराज  अपने एक चर्चा में चित्रकर्मा  से कहते हैं कि शास्त्र ज्ञानी  को कर्म ज्ञान की अभाव ,कर्म  ज्ञानी  को  शाश्त्र  ज्ञान की कमी  होने के इतर जो शाश्त्रज्ञान व कर्म ज्ञान  में समान   प्रज्ञा -वान हों  वे ही उत्तम कलाकार हो सकते हैं

                संगीत साहित्य कला  विहीनाः साक्षात्पशु:  पुच्छ विषाण  हीनः
                ते मर्त्य लोके भुविभार भूतः      मनुष्यरूपेंण मॄगाश्चरन्ति :

              जो मनुष्य  सगीत साहित्य कला से विहीन है वे साक्षात् पशु  के समान है ,  यद्यपि  उनके सींग  और पूँछ नहीं होते फिर भी वे पशु समान  है
               कला का ,समकालिक जीवन  का परस्पर सम्बन्ध किंचित मात्र भी नहीं है या  रहना नहीं चाहिए ऐसा किसी ने नहीं कहा है ,लेकिन यह सम्भन्ध कैसा हो  ,कहाँ तक यह सम्भन्ध स्पष्ट ,विदितमय हो  ,कहाँ तक गुप्त हो और व्यंगात्मक होना चहिये , यदि हो तो युक्तायुक्त होने की चर्चाओं में अभिप्राय भेद हो सकते हैं .यह अभिप्राय किसी एक युग में विद्यमान दूसरे युग में भिन्न रूप में होना सदा  इतिहास में दिखाई दे सकता है
                कलाकार निरंकुश ही होता है'''... कला भी नियम रहित  होता है ....अनन्य परतंत्र  भी है ....ह्लादैकमय या आल्हादमय हो सकता है किन्तु कोई भी कृति निर्माण मात्र कलाकार के लिए नहीं होता है ...सह्रिदयीयों को भी उसके सौन्दर्य आस्वादन ,अनुभूति मयी  व आनंदित होने पर ही वह कला कृति  सफल होती है . अतः वस्तु ,स्वरुप ,शैली ,वर्ण समकालिकों को आकर्षित कर आनंद पहुंचाए बिना कला कृति निरुपयोगी और निरर्थक होगा ...
                मानव -प्रकृति में भले बदलाव न आया हो ,जीवन की अवस्थाएं भले न बदली हों ,मानव स्वभाव सर्वसामान्य होने पर भी ...आचार ,विचार  ,व्यवहार ,आशाएं ,आदर्श ,जीवनविधायें  बदलती रहती हैं ...व्यक्ति
हो,संस्था हो ,समाज हो ,प्रान्त हो ,देश हो परिवर्तन तो सहज लक्षण है ...भौतिक  प्रपंच मे ..प्रति क्षण परिवर्तन है ही ,जीवन प्रपंच में भी वैसा ही है सामाजिक जीवन में भी  कालानुगत परिवर्तन  होते ही रहते हैं
,राजकीय  स्तर  सा  ,आर्थिक स्तर सा  पारमार्थिक स्तर सा ही कलाओं  में भी परिवर्तन  हुए बिना नहीं रह सकता है.....
                 कलाकार स्वतंत्र  होता है ....सृष्टि कर्ता  या सृजन कर्ता होता है ...तब भी समकालिक परिस्थितिओं का परवर्ती है। कलाकार को,जीवन से ,समाज से ,सन्निहित सम्बन्ध तो रखना ही पड़ता है ,अनादि से यह सम्बन्ध है ,भी ...सभी देशों में ,सभी कालों में अपनी प्राचीन कला भी देश -काल  के गुणों से ही प्रकट हुई है हवा में  से तो  नहीं ही आई ...उस उस काल के राजकीय परिस्थितिओं ,मत परिस्थिति ,,देश परिस्थितिओं के कारण
आविष्कृत हुई हैं हमारी कलाएं .....
                 कला  जीवन से दूर नहीं होना चाहिए ,जब यह दूर हो जाएगा तब निर्जीव  होकर शुष्क होकर नाश हो जायेगी ..कला  वर्तमान  जीवन का प्रतिबिम्ब है ...कला को समकालिक जीवन ही आधार है ...समकालिक का अर्थ
संकुचित अर्थों के  भाव से नहीं लेना चाहिए  ..प्रतिबिम्ब का अर्थ वार्ता पत्रिकाओं  के समाचार ,न्यूज़ रील जैसा नहीं लेना चाहिए ...क्या  क्या ,कैसे कैसे  भाव ,कैसे कैसे आदर्श ,कैसे कैसे संघर्ष ,कैसी कैसी समस्याएं
 यथार्थ जीवन में भरे होते हैं वह सभी कला के लिए सामग्री ही हैं ,इसी के क्रम में   इसी के अनुगुण - अवगाहित  होने वाले अच्छी  कहानियां , पूर्व के इतिहास में घटित घटनाओं ,पौराणिक वाङ्गमयो, उपनिषदिक  उपदेश -गाथाएँ  ,भविष्य के स्वप्न इत्यादि कला कृति के लिए उपयोगी वस्तु है   वैसे कलाकार को उपकार  नहीं करने वाली वस्तु इस संसार में कुछ भी नहीं है। किसी भी वस्तु को  रसमय सौन्दर्य प्रदान करने की शक्ति कलाकारों में होती
है ...परन्तु वे समकालिक जीवन से सम्बन्ध से इतर वस्तुओं का उपयोग नहीं किये है ....
                .उत्तम कला कृति समकालिक जीवन के लिए प्रतिबिम्ब  का कार्य ही नहीं  करती  बल्कि कभी कभी लोगों के जीवन संवारने  और संस्कारित करने का कार्य  भी करती है   ... और  अनजाने में कलाकार परकाया प्रविष्ट
योग  तक अनुभव करता है ...कलाकार की साधना उसके  भाव जगत को  इतना  शशक्त बनाता है  कि उसका प्रभाव आस पास की वातावरण ही नहीं जनजीवन में नयी चेतना जागृत कराता है ...क्योंकि साधारण उच्चारित शब्दों से प्रभावी भाव जगत से निकले शब्द ही स्थायी रूप से अन्य के हृदयों में स्थायी स्थान बनाती हैं ,वे ह्रदय से निकले शब्द होते हैं ... कला कृतिओं के प्रस्तुति  के प्रभाव से जीवन - विधानों में परिवर्तन  भी संभावित है।। कलाकार समाज के लिए मार्गदर्शक है ...प्रतिभा संपन्न कलाकार अपने उत्कृष्ट कला सृजन से अपने प्रदेश तत्द्वारा सर्व देशों को हस्तगत करेंगे मेरा विश्वास है..मैं कलाकार नहीं हूँ ..स्वल्प ज्ञान में जो उद्रेक कला के प्रति है
व्यक्त करने का अवसर मिलो तो वमन किया ...कला ज्ञानी क्षमा करेंगे .......
               सांस्कृतिक  संगम  के द्वारा ललित कलाओं  की साधना में संलग्न सभी विधाओं के साधकों को एक मंच पर आकर  एक साथ काम करने का अवसर मिलता है ,जिसमे साहित्य ,गीत,संगीत ,चित्रकला ,वादक,गायक,ध्वनि यांत्रिक,प्रकाश व्यवस्थापक ,,मंच सज्जा व  बढाई ,रंग पुताई ऐसे  कितने ही कलाओं में निपुण लोग के संयोग से  नाट्य कला मंचन की प्रस्तुति होती है। बस केमेरा  मैन  और एडिटर  हो तो उसे फिल्म ही समझें . ,हाँ फिल्म  बनाने
में ४ से  ६ महीने लगेंगे ,पर मंजे कलाकार हो तो दो दिन में नाटक तैयार कर मंच पर प्रस्तुति हो जाती है,वही तीन घंटे का प्रदर्शन.लोकेशन की पूर्ति   तो प्रॉपर्टीज  की भव्यता ही  पूरी  कर  देती है। .
क्रमशः



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