SANSKRITIK SANGAM,Salempur

     DEDICATED TO TRADITIONAL CULTURE AND TO THE ASPIRANT'S FOR ACTING ON STAGE PLAYS,TV SERIALS AND FEATURE FILMS 

     THE ARTS OF POORVANCHAL.
        (EAST UTTAR PRADESH)    
                 पूर्वांचल की कलाएं .

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                                                                              पूर्वांचल की कलाएं 

               

              अनेकता में एकता को संजोये हुए हमारा देश भारत,उस गुलदस्ते की तरह है जिसमें भिन्न-भिन्न रंगों के फूलों एवं पत्तियों को इस तरह रखा जाता है कि उनकी शोभा द्विगुणित हो जाती है। इसी तरह हमारे देश की सीमा के विभिन्न राज्यों एवं  क्षेत्रों की अपनी अलग अलग भाषा एवं संस्कृति के साथ साथ  इन  क्षेत्रों की अपनी अलग ही लोक गीतों व लोक नृत्यों की समृद्ध विरासत भी हैः जो आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौंध में कहीं न कहीं लुप्त होती जा रही है। 

              संगीत साहित्य कला विहीनाः साक्षात्पशु: पुच्छ विषाण  हीनः
              ते मर्त्य लोके भुविभार भूतः  मनुष्य रूपेंण मॄगाश्चरन्ति :
              जो मनुष्य  सगीत साहित्य कला से विहीन है वे साक्षात् पशु  के समान है, यद्यपि  उनके सींग  और पूँछ नहीं होते फिर भी वे पशु समान  है, विद्वानों का मानना है कि जो जनजातियां नाचती गाती नहीं - उनकी संस्कृति मर जाती है ,समाप्त हो जाती है। 
ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि हम विलुप्त हो रही इन लोक नृत्यों एवं लोक गायनों के धरोहर को संजो कर नहीं रख पाये तो आने वाली पीढ़ी के लिए इसकी जानकारी भी शेष नहीं रह जायेगी।साधरणतयःदेखने को यही मिलता है कि लोग गीतों की धुन पर झूमते लहरते और नृत्य करते पाये जाते हैं और जो लज्जालु किस्म के लोग होते हैं वे गीतों का आनंद तो लेते ही हैं मन ही मन गुनगुनाते जरूर हैं और कुछ लोग चार दीवारों के बीच छिप कर नाचने गाने वाले भी हैं या कुछ लोग मधुर गीत भुलाये नहीं भूलते ,मन ही मन याद कर के ,आतंरिक व् मानसिक नृत्य चलता ही है, नहीं तो सुन कर आनंदित जरूर होते हैं , इस बात का ध्योतक है कि गीत से नृत्य का सम्बन्ध है दूसरी ओर यदि नृत्य करने का मन हो या  नृत्य का आयोजन  करना हो तो गीत और संगीत की आवश्यकता तो होती ही है जिसके द्वारा शारीरिक  व् मानसिक हाव भाव के  माध्यम से गीत के बोलों के अर्थ अभिव्यक्त कर दर्शकों व् श्रोताओं का मनोरंजन कर आनंदित  व्  आकर्षित कर सके। इस तरह नृत्य का गीत व् संगीत से एक गहरा सम्बन्ध है एवं वे एक दूसरे के पूरक भी हैं।

      

              लोक नृत्य में लोक गायन व् लोक गायन में लोक नृत्य .

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*धोबी - नृत्य 
धोबी जाति द्वारा मृदंग , रणसिंगा ,झांझ , डेढ़ताल , घुँघरू ,घंटी बजाकर नाचा  जाने वाला यह नृत्य जिस उत्सव में नहीं होता , उस उत्सव को अधूरा माना जाता है। . सर पर पगड़ी , कमर में फेंटा , पावों में घुँघरू ,  हातों  में करताल के साथ कलाकारों के बीच काठ का सजा घोडा  ठुमुक- ठुमुक नाचने लगता है तो गायक - नर्तक भी उसी के साथ झूम उठता है। .टेरी ,गीत ,चुटकुले के रंग , साज  के संग  यह एक अनोखा नृत्य है।


*अहीरों का नाच (फरुवाही )

अहीर स्वयं में एक संस्कृति है। यह वीरों की संस्कृति है। लोरिकी, बिरहा, गड़थैया,कुर्री-फुर्री-कलैया, मानो जैसे कि वे पेट से ही सीख कर आते हैं। परन्तु ऐसा माना जाता है कि अहीर 'उज़बक' होते है और उनकी पत्नियां बुद्धिमती होती हैं। पुरुष डोर, चौरासी, शहनाई, घुँघरू पहनकर हाथ में धुधुकी लेकर धोती कुरता पहनकर सिर पर पगड़ी बांधकर उछाल कूद करते हुए गीत की पंक्तियाँ टेरते हैं। ये बीच- बीच में 'हा- हा',  'हू-हू' की आवाज़ करते हैं। कलैया मरते हैं। नाचते समय ये 'लोरकी गाथा' की पंक्तियाँ अथवा 'बिरहा' की पंक्तियाँ दुहराते हैं।


* कहरही (कहरुआ नृत्य )

'कंहारों' का पुस्तैनी पेशा पालकी ढोना था। बाद में ये मिटटी बर्तन भी बनाने लगे। इस काम में उल्लास के लिए इन्होने नाचना -गाना भी अनिवार्य समझा। अतः चाक की गति के संग-संग गीत भी गुनगुनाने लगे। 'संघाती' घड़े पर ताल देने लगे और ठुमकने भी लगे। ओरी-ओरियानी खड़ी होकर महिलाएं गीत दुहराने लगीं। इस प्रकार नृत्य,गीत, वाद्य का समवेत समन्वय हो गया और उससे एक विधा का जन्म हो गया जिसे 'कंहरही' कहते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जहाँ इनकी बस्ती है, ये लोग अपने आनंद और आल्हाद के लिए, श्रम -परिहार के लिए, मधुर धुन,लय,ताल में नाचने-गाने लगे।


*  गोड़उ  नाच 

पूर्वांचल के गोरखपुर, देवरिया और बलिया जिलों में 'गोड़उ' नाच का प्रचलन है। इसमें नृत्य के साथ प्रहसन भी होता है। नृत्य का प्रमुख भाग 'हरबोल' कहा जाता है। यह प्रहसन के रूप में जो भी करता है उसे 'हरबोलाई' कहते हैं।इस नृत्य में श्रृंगार तथा भक्ति के गीतों का समावेश रहता है।


* नटुआ नृत्य

'खटिकों' की तरह चर्मकार जाति के लोग 'नटुआ' नाच करते हैं। पहली फसल कट जाने पर फाल्गुन -चैत की चांदनी रात में यह द्वार-द्वार जाकर नाचते-गाते और बदले में कुछ अनाज या पैसा पाते थे। ये लोग बरी-भात और पूड़ी पर नाचते थे। अब अपनी बस्ती में वृत्त - अर्धवृत्त बनाकर घुमते हुए नाचते और हास्य - व्यंग में अभिनय करते हैं। रंग - बिरंगी गुदड़ी पहने चूना कालिख लगाये प्रहसक अश्लील् चुटकुले बोलता है। नर्तक बीच में नाचता है। एक टेढ़ी छड़ी अनिवार्य होती है। ढोल ,छड, घंटी, झांझ, छल्ला, पावों में पैरी, कमर में कौड़ी बांधे नर्तक हास्य का माहौल सृजित कर देते हैं।


* कोलदहकी नाच 

'कोल' शिकारी वर्ग की जनजाति है, जो 'हकवा' करके जानवरों का अथवा गोटी - गुलेल से उड़ती चिड़ियों का शिकार करती थी। उसके इस नृत्य में उसके जीवन की झांकी देखी जा सकती है। गोला या अर्धगोला बनाकर ,ढोल बजाकर, बैठकर अथवा खड़े होकर, दिन भर के परिश्रम के बाद, चौपाल लगाकर यह नृत्य किया जाता है। औरतें और बच्चे तमाशबीन होते हैं।   


* खटिकही  नाच 

साग- सब्जी बेचने, सूअर पालने का काम करने वाली खटिक जाती अपने आनंद आल्हाद के लिए विवाह, गवना ,पूजा, पालकी के अवसरों पर झंडा लेकर जुलुस निकालकर पालकी में दूल्हे को बिठाकर तेज चलते हुए बीच - बीच में रुक- रुक कर ,कभी नीचे स्वर में और कभी ऊंचे स्वर में आवाज़ निकालते हुए , नृत्य करती हैं। छड़,थाली, ढोल, झाल के समवेत स्वर से आकाश गूँज उठता है।


* मुसहरी नाच 

'मूस' यानि चूहे का शिकार करने वाली 'मुसहर' जाति पूर्वांचल की एक विचित्र जाति है। ये गांवों के किनारे अलग बस्ती बनाकर रहते हैं और भोर ही में 'सवरी' (एक विशेष प्रकार का चूहा मारने का औजार) लेकर खेत खलिहान में पूरे परिवार के साथ निकल जाते हैं। खेत खलिहानों में बिल के भीतर चूहों द्वारा एकत्र किये गए अनाज को उसमें पानी भरकर निकालते हैं। इनका एक पंथ दो काज हो जाता है। अर्थात एक ही गोटी से दो शिकार-चूहा और अनाज। वे दिनभर की इस कमाई को लेकर आते और गांजा का दम लगाकर झंडे गाड़कर 'ढोल' और 'हुडुक' बजाकर झूमकर नाचते हैं।  यह हुडुक वाद्य 'गोहटी' के चमड़े से वे स्वयं बनाते हैं। 


* डोमकच नाच 

पूर्वांचल में मुख्य रूप से सोनभद्र जनपद के सुदूर वनों - पहाड़ों के मध्य 'घसिया' जाति के आदिवासी निवास करते हैं। ये कैमूर की गुफाओं में न जाने कब से निवासित हैं तथा मादल, ढोल, नगाड़ा, बांसुरी, निशान, शहनाई आदि वाद्य बनाकर बेचते और उसे बजाकर नाचते - गाते भी हैं।पहले ये राजाओं के यहाँ घोड़ों की 'सईसी' करते थे। इन्होने एक बार अस्पृश्य मानी जाने वाली डोम जाती का स्पर्श करके नाच - गाकर खुशियां मनाई तभी से विवाह,गवना, अन्नप्राशन,मुंडन अथवा होली,दशहरा, दीपावली आदि अवसरों पर पूरे परिवार के साथ नाचने की परंपरा इनमें चल पड़ीं। ये लोग नाचते समय कई कलाओं का प्रदर्शन भी करते हैं।


* ज्वालामुखी अगरही देवी नृत्य 

'अगरही' पूर्वांचल के आदिवासियों का एक प्रमुख नृत्य है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसे अगरिया जनजाति के पुरुष वर्ग के लोग जुलूस के रूप में करते हैं। सोनभद्र जनपद में शक्तिनगर के समीप ज्वालामुखी देवी का धाम है। वहां दोनों नवरात्रों में मध्य प्रदेश के सीधी - सरगुजा ,बिहार के रोहतास - पलामू , उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर - सोनभद्र के हजारों आदिवासी मादल ,ढोल ,मजीरा बजाते हुए लंगोटी लगाकर ,बाल मुंडवाकर ,रोली लगाकर,बाना त्रिशूल लेकर यहाँ आकर मंदिर के चारों ओऱ नृत्य करते और त्रिशूल ,नारियल ,माला  चढ़ाकर अथवा बकरे की बलि चढ़ाकर पूजा करते हैं। यह दृश्य तब रोमांचकारी हो जाता है जब वे अपनी जिव्हा में तीखा बाना धंसा लेते हैं और देवी कृपा से रक्त की एक बूँद भी नहीं चूती। अगरिया पत्थर को पिघलाकर लोहे से बर्तन - औजार बनाने वाली शिल्पी वर्ग की जनजाति है।  


* करमा नृत्य 

'करमा' आदिवासियों का विश्वप्रसिद्ध नृत्य है।आदिवासी जहाँ भी है करमा नृत्य अवश्य करते हैं।  खरीफ की फसल बो दिए जाने के बाद अनंत चतुर्दशी और फिर रबी की फसल करने के साथ होली के अवसर पर यह नृत्य स्त्री -पुरुष ,बाल - वृद्ध सभी एक साथ समूह में करते हैं। उनका यह अनुष्ठान लगभग एक माह पूर्व से ही प्रारम्भ हो जाता है। 'जयी'  जमाई जाती है। कदम्ब वृक्ष की डाल किसी कुंआरी कन्या अथवा गांव का बैगा द्वारा एक ही बार में काट कर लाई जाती है।गांव अथवा गांवों के सभी आदिवासी उसे जमीन पर धरे बिना नाचते गाते किसी सार्वजानिक स्थल पर लाते  हैं, उसे वहीँ रोपते हैं। दारू का प्रसाद चढ़ाते और फिर नाचना शुरू करते हैं, तो वह सिलसिला चौबीस घंटे चलता है , यदा- कदा  युवक -युवती के पांवों के यदि अंगूठे मिल जाते हैं, तो वहीँ उनका विवाह भी करा दिया जाता है। "करमा" पुरुषार्थ व् पर्यावरण का प्रतीक नृत्य है।


* जनजातींय  इन्द्रवासी नृत्य 

 'धरकार' एक ऐसी जनजाति है जो मुख्य रूप से वाद्य यंत्र बनाकर अथवा डलिया - सूप बनाकर अपनी जीविका चलाती है और जब वाद्य यंत्र बनाती ही है तो नाचना गाना भी होता ही है। पूर्वांचल के सोनभद्र सहित अन्य जनपदों में बांस-वनों के समीप निवास करने वाली यह जनजाति निशान (सिंहा), डफला, शहनाई, बांसुरी, ढोल, मादल बना कर और बजाकर , झूम कर जाने कब से नाचती -गाती आ रही हैं। विवाह, गवना, मेले - ठेलों में या फिर बाजारों में भी होली - दीपावली, दशहरा,करमा  आदि पर्वों पर ये लोग इन्द्रवासी नृत्य करके सबको मुग्ध कर देते हैं। 


* झूमर नाच 

विवाह,गवना,यज्ञोपवीत,मुंडन,अन्नप्राशन आदि संस्कारों तथा दीपावली,दशहरा,अनंत चतुर्दशी के अवसरों पर महिलाएं हाथ में हाथ मिलाकर वृत्त या अर्धवृत्त बनाकर झूमर नाचती और गाती हैं। टेक की बार- बार आवृति तथा द्रुतगति और लय के आरोह- अवरोह के साथ  गाकर नाच जाने वाला यह नृत्य पूर्वांचल की एक प्रमुख नृत्य है।आदिवासी महिलाएं 'कछाड़' मार कर अपने वन्य वेश -भूषा में जब झूमकर नाचने लगती समां बंध जाता है। यदा -कदा थपोरी भी बजाती हैं। महुआ बीनने ,पत्ता तोड़ने ,गोदना गोदने का  कार्य के साथ अभिनय करती हैं। इसे धांगर , धरकार , घसिया , गोड जाति की महिलाएं बीया गडनी के अवसर पर विशेष उत्साह के साथ किसी नदी या तालाब के किनारे एकत्र होकर नाचती हैं। नृत्य के बीच - बीच में वन की बोली 'हूं  - हूं' करती रहती हैं।


* शैला नृत्य 

शैला ,मध्य प्रदेश,बिहार,उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में आदिवासियों के मध्य एक लोकप्रिय नृत्य है।  इस नृत्य में पूरे गांव के युवक सम्मिलित हो सकते हैं।  इसकी तैयारी भी 'करमा' की तरह एक माह पूर्व से ही आरम्भ  जाती है। युवक आदिवासी पोषक में मोरपंख कमर में बांध कर वृत्त या अर्धवृत्त बनाकर नाचते हैं। हर युवक के हाथ में दो -दो फुट का डंडा होता है जिसे लेकर वे नाचते हुए ही आगे -पीछे होते रहते हैं। घुँघरू बांधकर मादल लेकर बजाते हुए बीच बीच में 'कू - कू ' या 'हूं  - हूं'  की आवाज़ करते हैं जिसे 'छेरवा' कहा जाता है।  होली , दीपावली ,दशहरा , अनंत चतुर्दशी , शिवरात्रि के अवसर पर यह नृत्य किया जाता है।


* बिदेसिया नृत्य 

बिदेसिया' बिहार राज्य की उपज है ,किन्तु पूर्वांचल में भी यह विधा अत्यंत ही लोकप्रिय है।  इसके जनक श्री भिखारी ठाकुर हैं।  नाट्य प्रधान इस नृत्य विधा में विदेश जाते या चले गए पति के साथ पत्नी की वार्ता का करुण दृश्य प्रदर्शित की  जाती है। भोजपुरी बोली में प्रस्तुत यह नृत्य आज भी बहुत ही लोकप्रिय है।


*कजरी  नाच 

यह ऋतुगीत है जो सावन - भादों के महीनों में खेतों खलिहानों  से लेकर शहरों  तक गाया व् नाचा जाता है। पूर्व में इसके अखाड़े हुआ करते थे , बड़े - बड़े दंगल हुआ करते थे। स्त्री - पुरुष सभी प्रतियोगिताओं में सम्मिलित होते थे।  नगर की वेश्याएं भी भाग लेती थीं। गायन के रूप में उत्पन्न यह विधा अब पूर्णतः नृत्य में परिवर्तित हो चुकी है।


*होली नृत्य 

होली मूलतः गायन विधा ही है किन्तु अब विशेष रूप से अवध क्षेत्र में इसे नृत्यात्मक बना दिया गया है।  होरी , जोगीरा ,कबीरा  इसकी शैलियाँ है।  होली के अवसर पर अथवा पूरी फाल्गुन माह भर यह गीत विशेष रूप से पुरुषों को उन्मुक्त और मतवाला बना देता है। युवक - युवतियां दोनों इस नृत्य में सम्मिलित होते हैं और ढोल , मंजीरा ,हारमोनियम , झांझ ,मृदंग के संग  गीत की पंक्तियों के बीच 'जोगीरा' छोड़ते जाते हैं।  


* लोरिकी - लोरकायन 

 लोरिकी पूर्वांचल की सबसे बड़ी गाथा है.  अब इन - गिने गायक ही बचे हैं। यह आभीर (अहीर)चमार , धोबी , नाई ,ब्राह्मण , कोल , सोनार आदि जातियों  की गाथा के रूप में मान्य रहीं हैं। 


* विजयमल 

यह पूर्वांचल की भोजपुरी लोकगाथा है  जिसमें मुख्य रूप से राजा विजयमल या बिरजेमल के बाल्यावस्था में ही अद्भुत वीरता और शौर्य प्रदर्शन का ओजस्वी वर्णन है।  

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