SANSKRITIK SANGAM,Salempur

     DEDICATED TO TRADITIONAL CULTURE AND TO THE ASPIRANT'S FOR ACTING ON STAGE PLAYS,TV SERIALS AND FEATURE FILMS 

---------------------------------------------------------------Above 40 thousands audience,The mob with control and The crowd with purpose only to watch  any open-stage-play presented by"SANSKRITIK SANGAM". Getting recorded responses.
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-----------------------------------------------------------------------    SYNOPSIS  OF THE PLAY   "MEGHDOOT KI POORVANCHAL YATRA" 

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Language...Bhojpuri .                                 Director...Manvendra Tripathi. Writer...Baldauji Vishwakarma.                 Duration....2.00 Hrs                                                    Genre....Musical-Dance-Drama . 

        

            Meghdoot Ki Purvanchal Yatra (MKPY), a musical-dance-drama, is a poetic description of year-round customs and cultural practices from Purvanchal (Eastern Uttar Pradesh and Bihar).  Inspired by Kalidasa’s Meghdootam and woven around Bhojpuri heartland, the play has completed 96 shows across India winning thousands of hearts through the journey of diverse emotions and fragrance of rustic art. 


           Cursed by Kuber to stay separated for a year with his newly-wedded wife, Yaksha asks Megh (the clouds) to convey his love to Yakshini when he arrives at Alkanagiri. Megh, now the messenger Meghdoot, travels across the Purvanchal witnessing beautiful customs, diverse emotions and warm social bonds through changing seasons. 


            Meghdoot’s journey begins with aŝadha maas and continues through saavan, bhado,kuanr,kartik,agahan,poos, magh, phagun, chait,baisaakh, jeth and others playing traditional songs like at birah,biraha, Kajari,Sohar ,Devi geet,Chhatha,Sram geet,During harvest Ullas geet, fagua,Holi geet,Pachara ,chhaiti,Chhaita , vivaah geet sung during wedding  like Tilak,Sagun,Chouka, Maiyageet,Haldi, Chumavan,Mandap,Shiv vivaah,Ram vivaah,Dwar pooja.Kanya daan,Sohag till Bidaai . Supported by traditional  poetic on-stage narration, 35 artists play different roles of villagers, youth, bride, groom, family members, priests demonstrating activities and interactions that define the true Bhojpuri culture.

      Contrasting to what is presented currently in popular Bhojpuri culture, "Meghdoot Ki Poorvanchal Yatra" is true and refreshing experience of Bhojpuri culture; indeed a revolution in its segment.

Cast and Crew.

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(PRODUCED ...Y SHANKER MURTI ,DIRECTED...MANVENDRA TRIPATHI , MUSIC...LATE  YUNUS KHURESHI.

SINGERS...RAMDARAS SHARMA,BRIJESH SHANDILYA,TULIKA UPADHYAY,RANJANA,ARCHANA SINGH etc.STAGE...BALINDER

ARTIST...MANVENDRA TRIPATHI,PIYUSH RAJ,MANISH SRIVASTAV, ARUN SINGH,PRABHAT MISHRA,RADHESHYAM GUPTA,SUNNYSINGH,NAVNEET JAISWAL,SUMEET,DEVESH,DEEPAK,PANKAJ,SEEPI,SHIVKUMAR MISHRA,RAVI AWASTHI,VIJAYSINGH,MEENAKSHI PANDEY,RINNI SINGH,SANDHYA SANJH,ROOPAM TIWARI,KHUSHI SAGAR,SAUMYA MURTI,ANKITA,ANKAKSHA,MEERADUBEY,PRIYA GUPTA,PRIYANKA MAHARAJ,POOJA GUPTA,)

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                                        "मेघदूत की पूर्वांचल यात्रा"

         महाकवि कालीदास की कालजयी रचना मेघदूतम्  को पूर्वांचल  की सीमा में समेटते हुए लिखी गयी "मेघदूत की पूर्वांचल यात्रा" भोजपुरी नाट्य -शिल्प के इतिहास में रचित अब  तक की प्रथम नृत्य - गीत - नाटिका है। 

       नायक युवा यक्ष अपने स्वामी कुबेर द्वारा श्रापित है और पत्नी वियोग का दिन चित्रकूट में काट रहा है। वन - पुष्पों एवं वन के नैसर्गिक वातावरण से उद्दीप्त हो वह अचानक गा  उठता है .....

            गह गह फूलेला बन फुलवा होss...........  

       उधर यक्षों के नगर अलकापुरी में पति वियोग से पीड़ित यक्षिणी भी अपना दर्द कुछ इस तरह बयां करती है..... 

            गह गह फूलेली बेयलिया  होss ..........

      अनायास यक्ष को आकाश में आषाढ़  के बादल दिखाई देते हैं। वह अपना विरह सन्देश मेघों के माध्यम से अपनी प्रेमिका तक भेजना चाहता है। दयालु मेघ यक्ष का सन्देश लेकर उसकी नगरी अलकापुरी की ऒर चल पड़ते हैं.......

            बिरहा के मारल यक्ष के सन्देश लेके 

            चली भइलें बदरा पूरब मोरे मितवा ss......

       आषाढ़ मास - पानी की बून्द - बून्द को तरसते लोग -तपिश से  चिटकी हुई धरती और मेघ से जन मानस का आग्रह.......

            एहो कारे बदरा तू आके हमरी दुअरा sss……… 

      रस तृप्त खेत खलिहान और सावन की रिमझिम फ़ुहार  तरुणियां  एवं बालाओं के मन में आंदोलित करती हुई सावनी फुहार अब तो कजरी का ही मौसम है .......

            सखी हे सावन मास सुहावन ssss… 

      भादों का महीना --कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन का महत्वपूर्ण कृष्ण जन्मोत्सव और सोहर के मधुर स्वर लहरी पर झूमता गाता मथुरा एवं गोकुल का जन समूह .......

            मथुरा में लेलें अवतार त s ss.......

     कुआर मास के नवरात्र में उल्लास - भरा वातावरण आदिशक्ति माता दुर्गा का पूजन अर्चन शक्तिपीठों पर गीत गाता , संकीर्तन करता हुआ जन समूह .... 

           तोहरे मंदिर के दुअरिया sss .......

    तीज - त्योहारों का पावन मास कार्तिक कोने - अँतरे का अंधकार मिटाने को कटिबध्द दीपमालिका -सृष्टि के प्राण एवं ऊर्जा के स्रोत सूर्यनारायण और उनकी आराधना का महाबल सूर्य - षष्टी - घाटे  - घटुआरे , उल्लास पूर्ण छठ का गीत गाती महिलाएं …

            केरवा जे फरेला घवद सेss …… 

     मेघदूत के जल - दान का प्रतिफल किसानों के अन्नपूर्ण घर आँगन एवं डेहरी -बखार , श्रम और उल्लास का सम्मिश्रण .... 

            रामा बगिया में पांच पेड़ अमवा sss....... 

     खेतों पर सरसों के फूलों की पीली चादर - माघ की सिरहन , ऐसे में भला कैसे वष में रहे मन .... 

             कैसे राखी मनवा मर के sss ......

     फागुन का मस्त महीना , भांग के नशे में झूमते - गाते लोग ,रंग -गुलाल उड़ाते ब्रज की बालाएं --- नन्दगांव के छोरे होली खेलो - होली खेलो रे --- 

             आज बिरज में होली है रे रसिया .... 

      होली का खुमार भला कैसे उतरे जब सामने खड़ा चइत अंगड़ाई ले रहा हो , अब तो राम ही बचाये … 

             चुअत अन्हरवे अजोर ओ रामा … 

      बइसाख - जेठ का महीना - बगिया में ऊपर आम के टिकोरे और महुआ के वृक्षों के नीचे बेसुध पसरे मादक महुओं के फूल - तिलक - विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों की भागदौड़ में सगुन, मैयागीत, चउका, चुमावन,  हरदी ,शिवविवाह , रामविवाह ,द्वारपूजा ,परिछावन ,कन्यादान, सोहाग  आदि संस्कारों के प्रमुख गीतों का आनंद के साथ बिछोह की पीड़ा में सिसकते हुए मेघ की यात्रा पूर्ण होती है। 

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                      उठो अहिल्या.

 Language...Hindi.                          Director.. Manvendra Tripathi. Writer..... Dr.SurendraDubey.      Duration ...2.20 Hrs.शैली /Genre.....Drama.

अहिल्या की कथा एक प्रख्यात आख्यान है। वैदिक  साहित्य से लेकर महाकाव्य  पुराणों तक इसके सूत्र मिलते हैं।  इस कथा से सम्बंधित तीन प्रसंग प्रमुखता से चर्चित है।  
१. इंद्र द्वारा गौतम पत्नी अहिल्या के साथ दुराचार ,
२. गौतम द्वारा इंद्र और अहिल्या को श्राप देना और 
३. राम के चरण स्पर्श से शिला बनी शापित अहिल्या का उद्धार।  
प्रस्तुत नाटक इसी कथा को आधार बना कर लिखा गया है। इस कथा को आज की समस्याओं , संभावनाओं  और आकांक्षाओं के अनुरूप परिवर्तित किया गया है। इंद्र गौतम से देव- दानवों के युद्ध में सहायता मांगने आते हैं। वहां वह परम सुंदरी अहिल्या को देखता  है।  वह अहिल्या पर मुग्ध- लुब्ध हो जाता है। छलपूर्वक एक  दिन अवसर पाकर अहिल्या के साथ दुराचार करता है।गौतम दोनों को श्राप देते हैं। नाटक में अहिल्या पत्थर बनती है, सामाजिक उपेक्षा से पथरा जाती है , पाषाणवत्  हो जाती है। गौतम के आश्रम की उसकी सखियाँ सुलभा और घोषा उसे सँभालने का काम करती हैं,किन्तु उनके पति भी आश्रम छोड़कर उनके साथ अन्यत्र चले जाते हैं। विश्वामित्र जब राम- लक्ष्मण के साथ मिथिला जा रहे होते हैं , बीच में गौतम का उजाड़ आश्रम मिलता है।  राम - लक्ष्मण की जिज्ञासा पर विश्वामित्र पूरी कथा बताते हैं। राम और लक्ष्मण सामाजिक और पारिवारिक उपेक्षा की शिकार बनी पथराई अहिल्या से मिलने की इच्छा प्रकट करते हैं। अहिल्या अवसादग्रस्त है, उसे पुरुषमात्र  से घृणा हो  गयी है। धीरे- धीरे राम और लक्ष्मण उसे उत्साहित और प्रेरित करते हैं। अहिल्या कहती है, .... अब तक इसी आशा से जी रही थी कि कोई तो आएगा जो नीच देवेन्द्र को दंड देगा। राम कहते हैं.…नहीं माँ , नहीं …… क्यों करती हो प्रतीक्षा किसी पुरुष का ? उठें ,जागें ,और अपनी मुक्ति का मार्ग स्वयं ढूंढें।  आगे कहते हैं .... तुम पवित्र हो माँ …उठो  माँ,उठो .... और हमें पवित्र करो . अपनी लघुता की कुंठा से मुक्त हो कर जीवन के राग छंद में पुनः सक्रिय हो, उठो.…अपने भीतर ही प्रकाश का संधान करो . माँ .... अपने भीतर ही फूट पड़ेंगे अजस्र स्रोत, शक्ति के,नहीं है बाहर कोई तुम्हारा  रक्षक, तुम स्वयं रक्षक हो . आदिशक्ति हो . उठो … शताब्दियों से दलित- पीड़ित सभी चेतना को जागृत कर उसे शक्ति का स्रोत दिखाया गया है, स्त्री का रक्षक कोई राम-पुरुष नहीं है . . .   वह स्वयं अपनी रक्षक है। 
           इस नाटक में सांकेतिक रूप में रावण को निरंकुश आतताई और आतंकवाद का पोषक दिखाया गया है। इसके हस्तक ,सुबाहु और मारीचि ने गहन वन प्रांतर में अपने उपनिवेश बना कर , यहीं से वे मनुष्यों और ऋषियों - मुनियों  पर आक्रमण करते हैं। इन शिविरों में नए राक्षस आतंकवादी भी बनाये जाते हैं।
          अगर किसी स्त्री के साथ कोई बाहुबली या धनपशु दुराचार करता है,तो समाज तो दूर उनके परिजन भी उसे स्वीकार करने में डरते  हैं।  वह उपेक्षा की शिकार पीड़ित-दलित स्त्री या तो पत्थर  बन जाती है , या आत्महत्या कर लेती है।  स्त्री चेतना  के  शशक्तिकरण को बल देने वाले इस नाटक में अंत में अहिल्या कहती है " मैं अहिल्या, मेनका पुत्री अहिल्या ,पापी को दंड दूँगी , इंद्र को दंड दूँगी।" इसी के साथ भीड़ से अनेक स्त्री स्वर उठते हैं I इंद्र को दंड दो  .... पापी को दंड दो। इंद्र सत्ता और शक्ति का प्रधान केंद्र है। उसके विरुद्ध स्त्री स्वर मुखरित होता है . समाज की घातक चुप्पी को तोड़ने वाले इस स्वर को मुखरित करने का काम करता है यह नाटक …… उठो अहिल्या।  

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"UTHO AHILYA-
"THE VIGOROUS DRAMA FOR WOMEN EMPOWERMENT.
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“Ram too is a man! How long would you rely on men? Rise, awake and punish Indra by yourself!” Charged with these words, Ahilya stands up and resolves to reclaim herself.


“Utho Ahilya”, is a powerful narrative relevant to problems, possibilities and expectations of today’s society and its indifference towards women.


Opportunistic Indra “deceptively” misbehaves with Ahilya while he comes to seek help from Gautam for Dev-Daanav war. Disappointed Gautam curses them both and leaves the ashram and innocent Ahilya behind. Ahilya is stoned of this indifference and apathy.


Vishwamitra, Ram and Lakshma were on their way to Mithila when they find the old-wrecked ashram and Ram comes to know of this sad story. Rama expresses his interest to meet Ahilya, who is stoned, depressed and has cultivated deep hatred against men. “I was waiting; for someone who would punish that lowly Indra”, says Ahilya. Upon which Rama encourages her not to depend on men for self-reclamation; but to break this killing silence society has worn for its indifference towards women. He empathizes how the powerful misbehave with women and society tends to ignore women leaving her behind to be stoned. Utho

Ahilya is an attempt to break this silence.

CAST AND CREW.

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( PRODUCED...Y SHANKER MURTI,DIRECTED...MANVENDRATRIPATHI, WRITTEN  SRI SURENDRA DUBEY,SONGS...GOURI SHANKER MISHRA.

SINGER...RAMDARAS SHARMA...MUSIC....MANOJ TRIPATHI....PINTU,ASHOK VALMIKI,J P MANI TIWARI..STAGE SET...BALINDER..

LIGHT AND SOUND...SANDEEP AND PRADEEP.

AHILYA....SAUMYA MURTI,GAUTAM....ANIL GAUR.,INDRA...MANISH SRIVASTAV,BRAHMA....SHIV KUMAR MISHRA,RAM....PRABHAT MISHRA,LAXMAN...PIYUSH RAJ,VISHWAMITR....SANJAY MISHRA,SULBHA.....ROOPAM TIWARI,GHOSHA........PRIYA GUPTA,AVINASH,PRATAP BALAJI,PANKAJ.)


 --------------------------------------------------------                         ढाई  आखर प्रेम का ( कबीर )
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भाषा ... अवधी                 निर्देशन /लेखक ......मानवेन्द्र त्रिपाठी  प्रस्तुतकर्ता .... वाई शंकर मूर्ति                                             समय …  २.३० घंटे                        विधा... नाटक एवं गीतमय 

        जब हम  सत्य ,मानवता ,प्रेम ,शांति  और अहिंसा की बात करते हैं तो   निश्चित ही हम गौतम बुद्ध के बाद कबीर की याद आ जाती है। कबीर  के शाब्दिक अर्थ महान का परिचय भी उनके व्यक्तित्व की प्रखरता, चरित्र की निर्मलता ,स्वभाव की सहजता, उनका निष्कलंक मन और उनके साधना की सराहना उनके प्रशंसकों  एवं विरोधियों में समान रूप से मिलती है। उनकी वाणी में अनुभूति की सच्चाई मिलती है। वे पूर्ण सत्य का साक्षात्कार करने वाले संवेदनशील संत थे।समाज सुधारक सर्वधर्म- समन्वयकारी हिन्दू- मुस्लिम ऐक्य  विधायक के रूप में और वेदांत व्याख्याता, दार्शनिक के रूप में भी चर्चित रहे हैं। वे भारतीय संस्कृति सागर के गहन मंथन से प्राप्त दिव्य नवनीत हैं। कबीर एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्होंने समस्त धार्मिक आडम्बरों एवं ब्रम्हाचारों को नकारकर सहज जीवन पद्धति को सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

        वर्तमान सामाजिक सामयिक संदर्भों में कबीर सबसे ज्यादा प्रासंगिक है। उनके द्वारा प्रत्येक के लिए आशा के द्वार खुलते हैं। कबीर से ज्यादा साधारण आदमी खोजना दुरूह है। 

         कबीर निपट गंवार, अनपढ़, गृहस्थ और श्रमजीवी हैं।जीवन भर कपड़ा बुनने और बेचने वाले कबीर के जाति का पता नहीं।जनश्रुति के अनुसार वे हिन्दू की कोख से पैदा हुए और मुसलमान के घर में उनका पालन -पोषण हुआ। कबीर न ज्ञानी है, न शिक्षित , न धनी , न सुसंस्कृत और न ही समादृत। 

        कबीर जैसा साधारण व्यक्ति अगर परं ज्ञान को उपलब्ध हो गया तो कोई भी हो सकता है। कबीर का पूरा जीवन एक सीधा- साधा आचरण है। एक ऐसा आचरण जो सभी दीवारों को ध्वस्त कर अनंत आकाश की यात्रा करता है जो धरती को नहीं आकाश को जीतता है , जो सभी प्रकार के विभाजनों के विरोध में खड़ा है। वर्तमान समाजिक परिदृश्य में कबीर को पढ़ना,  कबीर को सुनना और कबीर को देखना परम आवश्यक है। अस्तित्व के अनूठे नृत्य, परम रस के काव्य,  शून्य के संगीत और जीवन के महोत्सवमय कबीर के जन्म से मृत्यु पर्यन्त तक की यात्रा को मंच पर देख कर निश्चित ही उन कर्मकांडों के विरुद्ध तन कर खड़े होंगे और अंध विश्वासों को ध्वस्त करने का सiहस बटोरेंगे। 

     कबीरयुगीन निर्गुणोपासना,  रहस्यवाद, दार्शनिक विचार  व् सामाजिक दर्शन ,उन सभी पाठकों, आलोचकों व् अनुयायियों, शोधार्थियों हेतु एक  नवीन  विषय वस्तु तो है ही मनोरंजक व् सूचनादायक भी है।

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-4:14
मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे ?
मैं तो तेरे पास में 
ना तीरथ में , ना मूरत  में 
ना  एकांत निवास में ,
ना मंदिर में , ना मस्जिद में 
ना काबे कैलास में 
मैं तो तेरे पास में बन्दे
मैं तो तेरे पास में 
ना मैं जप में ,ना मैं टप में 
ना मैं बरत उपवास में 
ना मैं क्रिया करम में रहता 
ना ही जोग सन्यास में 
नहीं प्राण में नहीं पिंड में 
ना ब्रह्माण्ड आकास में 
ना में प्रकृति प्रवर गुफा में 
नहीं स्वासन  की स्वांस में 
खोजि होए तुरत मिल जाऊं 
इक पल की तलास में 
कहत कबीर सुनो भाई साधो 
मैं तो हूँ विस्वास में 

Where do you search me? 
I am with you 
Not in pilgrimage, nor in icons 
Neither in solitudes 
Not in temples, nor in mosques 
Neither in Kaba nor in Kailash 
I am with you O man 
I am with you 
Not in prayers, nor in meditation 
Neither in fasting 
Not in yogic exercises 
Neither in renunciation 
Neither in the vital force nor in the body 
Not even in the ethereal space 
Neither in the womb of Nature 
Not in the breath of the breath 
Seek earnestly and discover 
In but a moment of search 
Says Kabir, Listen with care 
Where your faith is, I am there. 

                  SHIRDI KE SAI BABA
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BABA'S  WELL KNOWN EPIGRAM "SABKA MALIK EK HAI"IF PERVADES IN THE  PANDAL AND  AUDIENCE .IMAGINE !! HOW YOU FEEL!!
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भाषा ....  हिंदी                                                      निर्देशन/लेखक......मानवेन्द्र त्रिपाठी     प्रस्तुतकर्ता .... वाई शंकर मूर्ति 

समय....  २.  ३० घंटे                                                      विधा......... नाटक एवं  गीत

सबका मालिक एक 

           एक अंग्रेज पर्यटक शिरडी सांई के स्थान पर आया हुआ है और देखता है कि एक औरत अपने मरणासन्न पति के जीवन के लिए बाबा से प्रार्थना कर रही है और उसी बीच वह जी उठता है। इस दृश्य को देख हतप्रभ हो जाता है कि एक पत्थर की प्रतिमा का चमत्कार , कि क्या ऐसा संभव हो सकता है ? यह सत्य है या स्वप्न ? उसका साथी बताता है कि ऐसी अनेकों शक्तियां इस धरा पर है, जो आश्चर्यचकित कर देते हैं। क्योंकि  ईश्वर  अपने अंश से महापुरुषों के रूप में अवतरित हो कर मानवता की रक्षा और भलाई के लिए आते रहते हैं। ज़ो हमने देखा वह भी सत्य है। अंग्रेज अपने मित्र से साईबाबा के विषय में जानने के लिए उत्सुक हो उठता है उसका मित्र उसकी जानकारी के अनुसार बताने लगता है.....
          कि एक बार बाबा से चाँद मियां मिले जब उनका घोडा कहीं ग़ुम हो गया था तो बाबा की कृपा से उनका घोडा उन्हें पुनः मिल जाता है। अक्सर बाबा शिर्डी में बाईजामा के यहाँ जाते थे जहाँ उनके गुरु का वास था। तात्या, अब्दुल, म्हाळसा, लक्ष्मी आदि उनके शिष्य बनकर उनके साथ द्वारका माई में रहते थे। बाबा सदा सभी में दया , प्रेम , करुणा का रस बरसते रहते थे और बताते कि जाति -पाती , उंच नीच की अवधारणा सही नहीं है।  सत्य एक ही है और "सब का मालिक एक "ही है।  

         बाबा  के समय में ही बाईजामा  देह छोड़ चुकी थी, उनसे मिलने बाबा तीन दिन के लिए समाधी में चले जाते हैं , उनके लौटने की प्रतीक्षा उनके सारे भक्त  बड़ी आतुरता से करते हैं ,तो अंग्रेज शासन को संदेह होता है कि कहीं इस बहाने हिन्दू मुस्लिम मिलकर उनके विरुद्ध कोई षड्यंत्र तो  नहीं रच रहे है ? इस बीच बाबा के चमत्कारों से अवगत होते हैं।  एक कोढ़ी को कोढ़मुक्त करना, एक अंधे की आँखों में ज्योति को लौटना , भक्तो के दुःख को पहले समझ कर उनके दुखों का निवारण करने जैसे अभूत पूर्व चमत्कारों से अभीभूत हो जाते हैं ,तीन दिनों बाद बाबा समाधि से लौट आते हैं , उसी  शिर्डी में एक निर्माणाधीन मंदिर में १५ अक्टूबर १९१८ को पूर्ण समाधि लिए जाने के पूर्व उन्होंने अपने भक्तो को ११ उपदेश दिए और कहे कि जब भी उन्हें मन से याद करेंगे  वे उनके पास रहेंगे।

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Devotion (Bhakti) is not like a fever medicine that you take when you are ill; it must be your daily vitamin to keep good physical and mental health. - Baba.

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SRI SAI BABA'S  11 ASSURANCES

Sai Baba encouraged charity, and stressed the importance of sharing. He said: "Unless there is some relationship or connection, nobody goes anywhere. If any men. or creatures come to you, do not discourteously drive them away, but receive them well and treat them with due respect. God will certainly be pleased if you give water to the thirsty, bread to the hungry, clothes to the naked, and your verandah to strangers for sitting and resting. If anybody wants any money from you and you are not inclined to give, do not give, but do not bark at him like a dog. Other favourite sayings of his were "Why do you fear when I am here" and "He has no beginning... He has no end.

Sai Baba made eleven assurances to his devotees: 

1.No harm shall befall him, who steps on the soil of Shirdi.

2.He who comes to my Samadhi, his sorrow and suffering shall cease.

3.Though I be no more in flesh and blood, I shall ever protect my devotees.

4.Trust in me and your prayer shall be answered.

5.Know that my spirit is immortal, know this for yourself.

6.Show unto me him who has sought refuge and has been turned away.

7.In whatever faith men worship me, even so do I render to them.

8.Not in vain is my promise that I shall ever lighten your burden.

9.Knock, and the door shall open, ask and it shall be granted.

10.To him who surrenders unto me totally I shall be ever indebted.

11.Blessed is he who has become one with 

------------------------------------------------                HARISHCHANDRA TARAMATI.
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Language...Hindi.                                           Director...Manvendra Tripathi. Writer....Manvendra Tripathi                           Duration....2.30 Hrs                                                    Genre....Musical--Drama .

Raja Harishchandra was a very honest king. He was known never to tell a lie. Once, Vishwamitr  came to test his faith. He came in his dream and asked his kingdom in charity..and physically appeared before and told Harishchandra to simply leave the palace be cause he donated in dream. He walked off with just his wife and son. Now the Vishwamitra disguised as a priest asked him to give him a donation (Dakshina) of half a kilo of gold. The king had left everything behind so how could he produce this wealth? Vishwamitr would not hear of it. He said he could grant him time but he must give him the dakshina. So he promises to work and give the half kg of gold in a months time.  Harishchandra and family reach another kingdom and go looking for work.They any how save the required dakshina, with their hard work.But Vishwamitr cleverly by his trick get  that  stolen.Atlast getting more time for giving dakshina they sale themselves in serfdom market and recieve the required amount of gold coins which in the form of dakshina they handover to Vishwamitr. Harishchandra got a job at a cremation ground. His wife Taramati got a job at a Pandits house whose wife is very jealous of her beauty status, so she gives her difficult tasks to do every day. Their son Rohitdas (Roidas) is appointed  to pluck flowers for the prayer every morning.  One day their son gets bitten by a snake in the garden while he is plucking the flowers for the master. Taramati runs around trying to find a cure for the snakebite. No help is given. The son dies. She takes the son to the cremation ground. Her husband refuses to cremate the child without being paid the duty fees. Taramati asks Harischandra to not having to pay any thing except her cloth which she was wearing  . While all this is going on and she was about to torn the piece of cloth,Vishwamitr  appears and revives his son and  takes back his promise returns his kingdom and past glory to him.

CAST AND CREW.

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(Manvendra Tripathi as Harishchandra,Deepti Anurag as Taramati,Sanjay Mishra as Vishwamitr ,Radhey Shyam Gupta,Navneet Jaiswal,Ravi Awasthi,Sunny Singh,Khushi Sagar,Roopam Tiwari,Priyanka Maharaj,Shivkumar Mishra.Arun Singh,Pankaj,Sumit,Avinash etc.Singer...Ramdaras sharma..Music...Manoj Tripathi,Pintu,Ashok valmiki,J.PMani,Lght & Sound...Pradeep & Sandeep..Stage...Balinder )

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                        रामायण मंचन

                              हम आपको श्रीराम के दरबार में उनके प्रिय पार्षद के रूप में आमंत्रित कर रहे हैं। रामकथा पुनर्नवा है। वह कभी समाप्त नहीं होती,उसका रस प्रवाह कभी नहीं रुकता। वह अनवरत बहती रहती है , दुःख में भी, सुख में भी, पीडा में ,उल्लास  में , काल की हर इकाई में ,आज- कल और समूचे इतिहास में राम वही राम है शाश्वत,सनातन,करुणामय, पुनर्जात भगवान।  ज्योतिर्मय   देवताओं  से भी अधिक प्राचीन और नित्य प्रगट होने वाली ऊषा से भी नवीन।
                              जीवन चेतना का नाम है। ऊर्जा का प्रवाह है जीवन।  यह प्रवाह कभी नहीं रुकता।  चक्र की  तरह आवर्तित होता रहता है । ब्रह्मा सृजन है , शिव विसर्जन ,और राम जीवन है। सारा संसार उपलब्ध है फिर भी हर क्षण छूटता जा रहा है।  जो किसी भी क्षण नहीं छूटता वही राम है। 
                              सतत वर्तमान वही राम पुनः -पुनः प्रगट होने  जा रहे हैं आपके बीच अपने समस्त लीला विलास के साथ। उसका साक्षी बनने  के लिए आपको नेवता दे रहे हैं , पांच पान और  नौ नारियल के साथ। सबका सहयोग होता है तभी उत्सव सुशोभित होता है।  
                              भारतीय मानस सत्य , पराक्रम ,और कोमलता की त्रिपुटी  में आज भी  राम ,लक्ष्मण और सीता को देखता है।  यही कारण  है  कि उसके संघर्षमय जीवन में राम की छबि है और राम  की गाथा उसके जीवन  की सम्पूर्णता की गाथा है -जो कभी पूरी नहीं होती ,पूर्ण से पूर्णतर होने के लिए नित नयी होती रहती है।  राम की शाश्वत लीला मात्र लीला नहीं है , एक जीवंत घटना है,जिसमें राम तो बार -बार घटित होते ही रहते हैं ,भक्त की  भक्ति भी निरंतर घटित होती है। राम का नया अभिषेक होता है तो राम में जीने वाला भक्त भी उस अभिषेक का एक घट बनकर पवित्र बन जाता है। 
                            राम की लीला साधारण अनुष्ठान नहीं है , एक महा जाति के कठिन तप  की परिणति है , कोटि -कोटि  उपवासों का पारण है , भक्ति की धारा प्रवाह वर्षा की झंकार है ,अपने  शरीर , इन्द्रीय -मन को मांजने की तैयारी  है।  इस भक्ति  यज्ञ  के होता के रूप में हम आपको आमंत्रित करते हैं।  
                            "सांस्कृतिक संगम " सलेमपुर की "रामायण  मंचन " हर  बार एक नए आयाम में प्रस्तुत की जाती रही है। रंगमंच के सिद्ध कलाकारों द्वारा इनकी प्रस्तुतिओं के रस में डूबकर आप निश्चय ही रस कलश में डूब जायेंगे। 
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         A true devotee would never get disgusted at any point of time, nor get bored, tired or vexed listening and viewing to the same spiritual teachings. You may perhaps be hearing and watching the same message over and over again from Ramayana,Krishna katha,Bhagawata ! How do you rationalize this? Don’t you take food repeatedly for the same stomach, several times during your lifetime? Don’t you wash the same face many times in a week? That music, which you consider as pleasurable, don’t you listen to it, many times frequently? Consider an even simpler example: you drink coffee or tea – have you ever got bored of it, despite consuming it for 15 or 20 years? You perhaps wait for that cup with excitement and enthusiasm, and will even get a headache if it is delayed by a couple of minutes! Similarly, it is essential to listen and watch to such spiritual instructions, ruminate and experience the joy of devotion without the slightest feeling of disinterestedness.
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FIRST PLAY BY TEAM
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"Meghdoot ki poorvanchalyatra" got unprecedented  response and appreciations.
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 SHORT VISUAL STORY LINE OF              MEGHDOOT KI....

  AT KANPUR MAHOTSAV

मेघदूत की पूर्वांचल यात्रा के गीत 

Track 2
RamDaras Tulika (Unknown Album (11/Oct/2009 11:37:35))
-50:47

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" UTHO AHILYA" VIDEOS
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STRONG EMOTIONAL DRAMA"UTHO AHILYA"

UTHO AHILYA  PART  3

27 TIMES PLAYED TILL THE DATE.

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DHAI AKHAR PREM KA
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    SHIRDI KE SAIBABA 
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HARISHCHANDRA TARAMATI.
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RAMAYAN MANCHAN
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